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ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਵੱਲੋਂ
ਸ਼ਰਾਬ ਦੇ ਬਰਾਂਡ ਦਾ ਨਾਂਅ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਰੱਖਣ ਦੀ ਕੀਤੀ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਨਿਖੇਧੀ

ਜਲੰਧਰ, 15 ਅਪ੍ਰੈਲ: ਅੱਜ ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਦੀ ਹੰਗਾਮੀ ਮੀਟਿੰਗ ਪ੍ਰਧਾਨ ਦਰਬਾਰਾ ਸਿੰਘ ਢਿੱਲੋਂ ਦੀ ਪ੍ਰਧਾਨਗੀ ਹੇਠ ਹੋਈ। ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਦਰਬਾਰਾ ਸਿੰਘ ਢਿੱਲੋਂ ਅਤੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਡਾ. ਰਘਬੀਰ ਕੌਰ ਨੇ ਸਾਂਝੇ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਲਿਖਤੀ ਪ੍ਰੈਸ ਬਿਆਨ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਵੱਲੋਂ ਸ਼ਰਾਬ ਦੇ ਸਪੈਸ਼ਲ ਬਰਾਂਡ ਨੂੰ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਦਾ ਨਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਵਾਨਗੀ ਦੇਣ ‘ਤੇ ਸਖ਼ਤ ਰੋਸ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦਿਆਂ, ਇਸ ਨੂੰ ਗ਼ਦਰੀ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦਾ ਅਪਮਾਨ ਕਰਨਾ ਕਿਹਾ। ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਹਕੂਮਤ ਦੀ ਗੁਲਾਮੀ ਵਿਰੁੱਧ 1857 ਦਾ ਗ਼ਦਰ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਜੰਗ-ਏ-ਅਜ਼ਾਦੀ ਦੀ ਲੜਾਈ ਸੀ। ਸੰਨ 1913 ਵਿੱਚ ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਵੱਲੋਂ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਅਖ਼ਬਾਰ ਇਸ ਭਾਵਨਾ ਨਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਸੀ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਲੋਂ ਦੇਸ਼ ਭਗਤਾਂ ਨੂੰ ਬਦਨਾਮ ਕਰਨ ਲਈ ਪਹਿਲੀ ਜੰਗੇ ਆਜ਼ਾਦੀ ਨੂੰ 1857 ਦਾ ਗ਼ਦਰ ਗਰਦਾਨਿਆ ਸੀ। ਗ਼ਦਰੀ ਦੇਸ਼ ਭਗਤਾਂ ਨੇ ਹਕੂਮਤ ਨੂੰ ਮੋੜਵਾਂ ਜਵਾਬ ਦੇਣ ਅਤੇ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਸ਼ਬਦ ਨੂੰ ਸਾਰਥਿਕਤਾ ਦੇਣ ਲਈ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਅਖ਼ਬਾਰ ਸਾਨਫਰਾਂਸਿਸਕੋ ਤੋਂ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ।
ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਨੇ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਸ਼ਬਦ ਇਨਕਲਾਬ ਲਈ ਵਰਤਿਆ ਸੀ। ਇਸ ਲਈ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਸ਼ਬਦ ਇਨਕਲਾਬੀ ਅਰਥਾਂ ਦਾ ਧਾਰਨੀ ਬਣ ਕੇ ਲੋਕ ਮਨਾਂ ਵਿੱਚ ਵਸਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਅਤੇ ਅੰਤਰਰਾਸ਼ਟਰੀ ਪੱਧਰ ਦੀ ਮਹਾਨ ਲਹਿਰ ਸੀ। ਸਾਲ 2013 ਵਿੱਚ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਵਰ੍ਹੇ ਨੂੰ ਅੰਤਰਰਾਸ਼ਟਰੀ ਪੱਧਰ ‘ਤੇ ਭਾਰਤੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਦੇਸ਼-ਬਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਬੜੇ ਉਤਸ਼ਾਹ ਨਾਲ ਮਨਾਇਆ ਗਿਆ। ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਨੂੰ ਇਤਿਹਾਸਕ ਮਾਨਤਾ ਦੇਣ ਲਈ ਕੇਂਦਰ ਸਰਕਾਰ ਵੱਲੋਂ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਮੌਕੇ ਡਾਕ ਟਿਕਟ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਵਿੱਦਿਅਕ ਅਦਾਰਿਆਂ ਅਤੇ ਜਨਤਕ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਨੂੰ ਸਮਰਪਤ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਆਯੋਜਨ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਦੇਸ਼ ਨਾਲ ਹਿੱਤ ਰੱਖਣ ਵਾਲੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਮਰਿਆਦਾ ਦੀਆਂ ਕਾਇਲ ਹਨ। ਸੁਤੰਤਰਤਾ ਸੰਗਰਾਮ ਵਿੱਚ ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਵੱਲੋਂ ਅਨੇਕਾਂ ਸੂਰਬੀਰ ਯੋਧਿਆਂ ਨੇ ਫਾਂਸੀ ਦੇ ਰੱਸੇ ਚੁੰਮੇ ਅਤੇ ਅੰਡੇਮਾਨ ਦੀ ਜੇਲ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਤਸੀਹੇ ਝੱਲੇ।
ਇਤਿਹਾਸ ਸਾਖੀ ਹੈ ਕਿ ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਗ਼ਦਰੀ ਸ਼ਹੀਦ ਕਰਤਾਰ ਸਿੰਘ ਸਰਾਭਾ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਇਸ਼ਟ ਮੰਨਦਾ ਹੋਇਆ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਜੇਬ ਵਿੱਚ ਉਸ ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਰੱਖਦਾ ਸੀ। ਪਰ ਅੱਜ ਸਾਡੇ ਹਾਕਮਾਂ ਦੀਆਂ ਕੁਚਾਲਾਂ ਕਰਕੇ ਅਜੋਕੇ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਦੀਆਂ ਜੇਬਾਂ ਵਿੱਚ ਨਸ਼ੇ ਦੀਆਂ ਪੁੜੀਆਂ ਹਨ।
ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦੀ ਇਨਕਲਾਬੀ ਵਿਰਾਸਤ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲਣ ਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਬਣਦਾ ਸਤਿਕਾਰ ਦੇਣ ਦੀ ਥਾਂ ਸ਼ਰਾਬ ਦੇ ਇੱਕ ਬਰਾਂਡ ਨੂੰ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਦਾ ਨਾਂਅ ਦੇ ਕੇ ਗ਼ਦਰੀ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦਾ ਅਪਮਾਨ ਕਰਨ ‘ਤੇ ਤੁਲੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਦਾ ਇਤਿਹਾਸ ਗਵਾਹ ਹੈ ਕਿ ਜਿਥੇ ਗ਼ਦਰੀਆਂ ਨੇ ਕੁਰਬਾਨੀਆਂ ਦੇ ਕੇ ਆਉਣ ਵਾਲੀ ਪੀੜ੍ਹੀ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਭਗਤੀ ਦੇ ਨਸ਼ੇ ਦਾ ਸੰਕਲਪ ਦਿੱਤਾ ਸੀ, ਉਥੇ ਸਾਡੇ ਮੌਜੂਦਾ ਹਾਕਮ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਨੂੰ ਸ਼ਰਾਬ ਦੇ ਨਸ਼ੇ ਵਿੱਚ ਡੋਬ ਕੇ ਬਰਬਾਦੀ ਵੱਲ ਧੱਕ ਰਹੀ ਹੈ।
ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਜਲੰਧਰ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਇਸ ਫੈਸਲੇ ਦੀ ਸਖ਼ਤ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਨਿੰਦਾ ਕਰਦਿਆਂ ਪੁਰਜ਼ੋਰ ਮੰਗ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਸ਼ਰਾਬ ਦੇ ਸਪੈਸ਼ਲ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਬਰਾਂਡ ਵਿਚੋਂ ਤੁਰੰਤ ‘ਗ਼ਦਰ‘ ਸ਼ਬਦ ਨੂੰ ਹਟਾਵੇ, ਤਾਂ ਜੋ ਗ਼ਦਰੀ ਸੂਰਬੀਰਾਂ ਵੱਲੋਂ ਗ਼ਦਰ ਰਾਹੀਂ ਦਿੱਤੇ ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਸੁਨੇਹੇ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਨੂੰ ਬਰਕਰਾਰ ਰਖਿਆ ਜਾ ਸਕੇ। ਇਸ ਮੀਟਿੰਗ ਵਿੱਚ ਮੀਤ ਪ੍ਰਧਾਨ ਕਾਮਰੇਡ ਅਜਮੇਰ ਸਿੰਘ, ਖ਼ਜ਼ਾਨਚੀ ਸੀਤਲ ਸਿੰਘ ਸੰਘਾ, ਸਭਿਆਚਾਰਕ ਵਿੰਗ ਦੇ ਕਨਵੀਨਰ ਅਮੋਲਕ ਸਿੰਘ, ਇਤਿਹਾਸ ਸਬ-ਕਮੇਟੀ ਦੇ ਕਨਵੀਨਰ ਕਾਮਰੇਡ ਨੌਨਿਹਾਲ ਸਿੰਘ, ਕਮੇਟੀ ਮੈਂਬਰ ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ, ਗੁਰਮੀਤ, ਪ੍ਰਿਥੀਪਾਲ ਸਿੰਘ ਮਾੜੀਮੇਘਾ, ਗੁਰਮੀਤ ਸਿੰਘ ਢੱਡਾ, ਚਰੰਜੀ ਲਾਲ ਕੰਗਣੀਵਾਲ, ਦੇਵਰਾਜ ਨਈਅਰ ਸ਼ਾਮਿਲ ਸਨ।

८३ वां शहादत दिवस - कनैडा में गूंजा भगत सिंह का पैगाम

ब्रेम्पटन (कनाडा) स्थित पियर्सन थिएटर में प्रवासी भारतीयों ने अपने वतन से सात समुन्दर पार भारत की जंगे आज़ादी के महानायकों भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की ८३ वीं शहादत बहुत संजीदगी और अकीदत के साथ मनाई.
इस कार्यक्रम का आयोजन इंडो कनेडियन वर्कस एसोसियेशन ने किया था. उपस्थित जनसमुह को पंजाबी साहित्य के जाने माने लेखक, पंजाब साहित्य आकादमी पुरूस्कार विजेता डाक्टर वारियाम सिंह संघु ने भगत सिंह की शहादत, उसके विचार और निजी ज़िंदगी के बारे में तफ्सील से बाते की. वारियाम सिंह संघु ने कहा कि हमें आज पत्थर का भगत सिंह नहीं चाहिए; हमें आज पगड़ी धारी या टोप धारी भगत सिंह नहीं चाहिए, भारत के नौजवानों को भगत सिंह का दिमाग चाहिए, उसके विचार चाहिए, उसका समर्पण चाहिए, उसके जैसी प्रतिबद्धताएं चाहिए जिसकी गैर मौजूदगी में वर्तमान भारत को भगत सिंह के सपनों वाला भारत बनाया जाना नामुमकिन है. उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद भारत के शासक दल लगातार भगत सिंह के बुत बनाने तस्वीरे लगाने में व्यस्त है लेकिन भगत सिंह के नक़्शे कदम पर चलने वालो को पुलिस की लाठियां, गोलियां और जेलें मिल रही है. इन दलों ने भारत की संसद में भगत सिंह का बुत भी लगाया है जिसके एक तिहाई सदस्य आपराधिक मामलों में मुलव्विस है. इसी संसद में भगत सिंह ने अपनी आवाज़ सत्ता तक पहुँचाने के लिए बम फेंके थे.

वारियाम सिंह संघु ने कहा कि आज भारत के हर शासक दल में भगत सिंह पर कब्ज़ा करने होड़ लगी है. आज किसी राजनैतिक दल के पास न कोई चरित्र है न नीति. मूल्य विहीन राजनीति अपने पापो को धोने के लिए भगत सिंह की शरण ले रही है. उन्होंने भाजपा नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि मोदी ने भगत सिंह को अंडमान भेजकर यह साबित कर दिया है कि उनका और भाजपा का भगत सिंह के बारे में ज्ञान शून्य मात्र है. उन्होंने कहा कि जिस तरह २००२ में गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार हुआ, १९८४ में सिखों को दिल्ली में जिस तरह जिंदा जलाया गया, जिस तरह पंजाब में दहशतगर्दी के दौरान बसों से उतार-उतार कर हिन्दुओं की हत्याएं की गयी, जिस तरह पूरे देश में सरकार आम जनता के प्रति अधिकाधिक हिंसक हो रही है, निश्चय ही यह वह भारत नहीं है जिसकी स्वतंत्रता के लिए भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव ने अपने प्राणों की आहुति दी थी. उन्होंने अकाली दल नेता प्रकाश सिंह बादल के दोहरे चरित्र पर चोट करते हुए कहा कि बादल एक तरफ भगत सिंह के नाम पर जलसे जलूस करते नहीं थकते लेकिन दूसरी तरफ प्रदर्शनकारी किसानों पर लाठी चार्ज करा कर उनकी पगड़ियाँ पुलिस के पैरों तले रौंदते है. कौन नहीं जानता कि भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने २०वीं सदी के आरंभ में किसान आन्दोलन खड़ा कर ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ जैसे स्वाभिमानी नारे से उन्हें लैस किया था. आज किसानों की पगड़ियाँ अकाली सरकार द्वारा पैरों से रौंदी जा रही है. वारियाम सिंह संघु ने अपने भाषण के अंत में जनता का आह्वान किया कि मौजूदा शोषण और काले अंग्रेजों के चुंगल से भारत को आज़ाद कराने के लिए जनता को भी अपने दोहरेपन से निजात लेनी होगी. भगत सिंह के पैदा होने की कमाना पडौस में नहीं अब उन्हें अपने घरो में भगत सिंह को पैदा करना होगा तभी भारत में एक समता मूलक, न्यायपरक, जाति विहीन गैर फिर्केवाराना समाज पैदा होगा तभी समाजवादी क्रांति होगी.

उपस्थित जनसमुह को संबोधित करते हुए भगत सिंह के भाई मरहूम कुलतार सिंह की बेटी इन्द्रजीत कौर के शौहर कामरेड अमृत सिंह ढिल्लों ने भगत सिंह की निजी बातों को विस्तार से बताया जिसे हाल में बैठे समस्त लोगों ने बड़ी उत्सुकता से सुना. ५ फुट १० इंच के भगत सिंह मिठाई के शौक़ीन थे और मिठाई में रसगुल्ला उन्हें सबसे अधिक पसंद था. फलो में उन्हें संतरा प्रिय था. सांडर्स की हत्या के बाद भूमिगत जीवन के दौरान हुई एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भगत सिंह राजगुरु और चंद्रशेखर आगरा में मंडी के पीछे किसी गुमनाम जगह रह रहे थे. राजगुरु ने उस कमरे की दीवार पर एक बिकनी पहने किसी लड़की का चित्र लगाया था. चंद्रशेखर ने उस तस्वीर का फाड़ दिया, वह गुस्से वाले थे और राजगुरु द्वारा वजह पूछे जाने पर जवाब दिया, हम क्रांतिकारी है हमें ऐसी तस्वीरो से कोई लगाव नहीं होना चाहिए. राजगुरु ने बहस करते हुए कहा कि हम संपन्न, सुखी समाज की कल्पना करते है. इस बहस के दौरान भगत सिंह चुप रहे लेकिन एक संपन्न समाज कैसा होगा? यह सवाल उन्हें सालता रहा और इस विषय पर अध्ययन करने जुट गए. फिरोजशाह कोटला मैदान में जब संगठन बनाने की निर्णायक बैठक हुई तब हिन्दुस्तान रिपब्लिक ऐसोसियशन में सोशलिस्ट लफ्ज़ भगत सिंह के कहने पर ही जोड़ा गया था. इस तरह सुखी और संपन्न समाज की परिकल्पना आगरा के उस गुमनाम कमरे में राजगुरु और चंद्रशेखर के बीच हुई बहस का सूत्रीकरण भगत सिंह ने समाजवाद के रूप में किया. अमृत ढिल्लो ने भगत सिंह के सिर्फ चार असली फोटो के बारे में भी तफ्सील से बताया और उनसे जुडी घटनाओं को भी बहुत निराले अंदाज़ में ब्यान किया.

लाहौर में जन्मे ‘कमेटी आफ़ प्रोग्रेसिव पाकिस्तानी कनैडियन’ की तरफ से आये फहीम खान ने जलसे को खिताब करते हुए कहा कि मानव जाति ने तीन बड़े शहीद पैदा किये. हजरत अली, गुरु तेग बहादुर और भगत सिंह. पहले दो शहीद अपने-अपने मज़हबी अकीदो के लिए शहीद हुए जबकि भगत सिंह का कद इस लिए बड़ा है कि वह किसी धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करे बिना पूरी कौम और दुनिया भर के मजदूर, किसानो, साम्राज्यवाद का ज़ुल्म सहने वालों के हको के लिए शहीद हुए. इस लिए मानव इतिहास में उनका मुकाम सबसे अव्वल है. उन्होंने बताया कि कि लाहौर में एक चौराहे का नाम भगत सिंह चौक रखने पर मुल्लाहों ने सख्त सियासी ऐताराज़ किया और मामला कोर्ट में भी ले गए. उन्होंने यकीन दिलाया कि पकिस्तान के हुक्मरानों को यह बात जल्द समझ में आ जायेगी कि भगत सिंह का हक़ पाकिस्तान पर भी है उतना ही है जितना हिंदुस्तान पर है.

सभागार में उपस्थित भगत सिंह की बहन बीबी प्रकाश कौर (जो बहुत वृद्ध है और कनैडा में ही रहती है) के बेटे रूपेंद्र सिंह मल्ली उनकी पत्नी कर्मजीत सिंह मल्ली, अमृत सिंह ढिल्लों, इन्द्रजीत कौर ने खड़े होकर जनता का अभिवादन स्वीकार किया.

कार्यक्रम में कवियत्री सुरजीत कौर, सुखचरण प्रीत और परमजीत कौर ने अपने कलाम सुनाये. बुजुर्ग कवि लक्ष्मण सिंह गाखिल ने भगत सिंह पर लिखा कलाम सुनाया और युवा कवि जीतेन्द्र पाल मान ने बहुत जोशीली कविता सुनायी. मक्खन बरार साहब ने अपनी नुकीली धारदार कविता से जलसे में नया रंग भरा वही सुखदेव- नवतेज भाईयों ने संगीत के साथ अपना कलाम पेश कर माहौल को सुर मय बनाया.

तीन घंटे से अधिक चले इस कार्यक्रम में प्रमुख आकर्षण भारत के प्रसिद्द नकाटकार गुरशरण सिंह द्वारा लिखा नाटक, ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ का मंचन किया गया जिसे शहनाज़ ने निर्देशित किया था और व्यवस्था कुलदीप रंधावा ने की थी. नाटक की प्रस्तुति इतनी सशक्त थी कि हाल में अनूठा पिन ड्राप साएलेंस रहा, ऐसा मंज़र किसी पब्लिक कार्यक्रम में शायद ही देखने को मिलता है.
हरेन्द्र हुंदल ने इंडो कनेडियन वर्कर्स एसोसिएशन के क्रिया कलापों की जानकारी देते हुए निजी कम्पनियों के बजाये पब्लिक कार इन्सुरेंस सेवा मुहैय्या कराने, मिनिमम वेज १४ डालर प्रति घंटा करने, ऐम्प्लोयेमेंट एजेंसीज पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाने के अपने एजेंडे को प्रस्तुत किया. कार्यक्रम का बेहद सफल और बड़े रोचक अंदाज़ में संचालन प्रोफ़ेसर जागीर सिंह कहलो ने किया. आई सी डब्लू ए के सदर सुरिन्दर सिधु ने सभी आगंतुको, सहयोगियों का धन्यवाद दिया. संगठन सचिव सुरजीत सहोटा ने समस्त नाट्य कर्मियों को भगत सिंह की तस्वीर छपी टी शर्ट्स भेंट की.ध्यातव्य है यह संगठन पिछले दो दशको ने कनैडा में शहीद दिवस का लागातार आयोजन कर रहा है. इस संगठन की बुनियाद कामरेड सूच के कर कमलो द्वारा हुई थी जो इस वक्त बेहद बीमार चल रहे है.

Mewa Singh Should be Recognized as Canadian Hero

 

A prominent writer and history researcher from Toronto has demanded that Mewa Singh be recognized as Canadian hero for sacrificing his life for the sake of civil rights, equality and diversity. Waryam Singh Sandhu, who was in Greater Vancouver over the past weekend repeated this demand during a series of events organized by different groups to commemorate the 99th death anniversary of Mewa Singh, who was hanged on January 11, 1915 for assassinating a controversial Immigration Inspector William Hopkinson.
Mewa Singh was a political activist, who was close to the Ghadar Party, a group of South Asian radicals that was formed in North America to fight against British occupation in India and racism abroad. Hopkinson was instrumental behind the shooting inside the Vancouver Sikh temple in September 1914 that claimed the lives of two South Asian leaders, including Bhaag Singh who was in the forefront of the struggles against discriminatory immigration policies, such as disfranchisement of the Indian immigrants and bar on bringing their families to Canada. Bhaag Singh was a member of the Ghadar Party that supported the South Asian passengers aboard the Komagata Maru ship which was denied entry under the controversial continuous journey law that was aimed at keeping Canada white. The ship was forced to return following two months standoff on July 23, 1914. The incident led to bloody clashes between the Ghadar Party supporters and toadies which culminated into the assassination of Hopkinson by Mewa Singh.
Since next year will be the centenary of Mewa Singh’s execution, Sandhu called upon the South Asian community to get organized and work together to get Mewa Singh recognized as Canadian hero. He pointed out that that it was due to people like Mewa Singh that the South Asian community got right to vote in this country and bring their families. “Today Canada celebrates its diversity, but do not forget that it wasn’t like this always. The multiculturalism in this country is an outcome of sacrifices made by people like Mewa Singh. If Canada really cherishes such values then what stops it from recognizing him as hero? He should not be treated as criminal anymore. ‘’
Sandhu, who is a diehard secularist, was also critical of the Sikh fundamentalists who are trying to appropriate the Ghadar history. “Mewa Singh and other Ghadar activists shouldn’t be merely portrayed as Sikh heroes. Although his Sikh heritage is undeniable, he actually represented the larger social justice struggle. ’’ Ghadar Party had members from the non Sikh communities as well and the party believed in secularism and social equality that wanted its members to keep religion and politics apart. The Canada based Sikh separatists have been trying to appropriate the Ghadar movement as majority of its supporters from the Sikh community. Mewa Singh was also a practicing Sikh.
Sandhu has authored a book in Punjabi; “Ghadari Babe Kaun San?’’ that directly challenges the propaganda of the Sikh separatists. He had narrowly escaped an attempt on his life years ago from the Sikh militants. He wrote many short stories based on religious violence.
He first spoke at an event organized by the Radical Desi Publications Limited in Surrey; where a moment of silence was observed in memory of Mewa Singh. Others who spoke on the occasion, included Sohan Singh Pooni, who authored a book on Canada based Ghadar activists, Raghbir Singh Sirjana, whose book on the Ghadar history is under production, Jagir Singh Kalhon, a progressive poet from Toronto and Manjit Singh Dhillon whose grandfather Niranjan Singh Pandori was a Ghadar activist. A book on the Ghadar history compiled and published by Desh Bhagat Yaadgar Committee Jalandhar was also released at the event.
On Sunday, Sandhu addressed a congregation at the Ross Street Sikh temple where prayers were held for Mewa Singh. Gurbaksh Singh Sanghera of the Mewa Singh Society announced that they will launch a petition seeking recognition of Mewa Singh as national hero soon. Later that evening Sandhu visited the heritage Sikh temple in Abbotsford which was once a nerve center of the Ghadar activities. He also attended a literary event organized by Punjabi Sahit Sabha Mudhli in memory of Mewa Singh.
Short URL: http://www.voiceonline.com/?p=24511
Posted by voiceonline on Jan 17 2014. Filed under British Columbia, Canadian News,Top Stories.


Hamdard Weekly, 17 January 2014

ਇਤਿਹਾਸਕ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਹੈ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਨੂੰ ਸਮਰਪਤ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ ਕੈਲੰਡਰ

ਜਲੰਧਰ, 21 ਜਨਵਰੀ: ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਜਲੰਧਰ ਵੱਲੋਂ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਨੂੰ ਸਮਰਪਤ 28 ਸਫ਼ਿਆਂ ਦਾ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ ਕੈਲੰਡਰ ਮਹਿਜ਼ ਤਾਰੀਖਾਂ ਦਾ ਵਰਨਣ ਨਹੀਂ ਸਗੋਂ ਸੰਗਰਾਮ ਨੂੰ ਹਰ ਘਰ ਪਰਿਵਾਰ, ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ, ਖੋਜ਼ ਕੇਂਦਰਾਂ ਅਤੇ ਲੋਕ ਹਿੱਤਾਂ ਨੂੰ ਸਮਰਪਤ ਕੇਂਦਰਾਂ, ਦਫ਼ਤਰਾਂ ਅਤੇ ਸਰਗਰਮੀਆਂ ਦੌਰਾਨ ਸਾਂਭਣਯੋਗ ਅਮੁੱਲੀ ਇਤਿਹਾਸਕ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਹੈ।

ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਦੇ ਟਰੱਸਟੀ ਡਾ. ਵਰਿਆਮ ਸਿੰਘ ਸੰਧੂ ਦੇ ਲੇਖਨ ਅਤੇ ਨਿਰਦੇਸ਼ਨ ‘ਚ ਕੁਲਵਿੰਦਰ ਖਹਿਰਾ ਟੋਰਾਂਟੋ, ਗੁਰਦੀਪ ਸਿੰਘ ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਹਾਲ ਜਲੰਧਰ, ਸਹਾਇਕ ਉਕਾਰਪ੍ਰੀਤ ਟੋਰਾਂਟੋ, ਸੀਤਾ ਰਾਮ ਬਾਂਸਲ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਕਰਕੇ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਕਮੇਟੀ ਟੋਰਾਂਟੋ ਦੇ ਸਹਿਯੋਗ ਨਾਲ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਮੁਹਿੰਮ ਲਈ ‘ਕੁੱਜੇ ‘ਚ ਬੰਦ ਸਮੁੰਦਰ‘ ਜਿਹੀ ਬਹੁਰੰਗੀ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਰਵਾਇਤੀ ਕੈਲੰਡਰਾਂ ਦੇ ਬੇਢੱਬੇਪਣ ਅਤੇ ਬਾਜ਼ਾਰੂ ਨਜ਼ਰੀਏ ਦੇ ਸਮਾਨਅੰਤਰ ਬਦਲਵੀਂ ਸਾਂਭਣਯੋਗ ਨਿਸ਼ਾਨੀ ਹੈ।
ਇਹ ਕੈਲੰਡਰ ਮੁੱਢਲੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ ਵਜੋਂ ਪੰਜਾਬੀ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਦੋ ਭਾਸ਼ਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਇਕੋਂ ਸਮੇਂ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਪਰ ਅਜ਼ਾਦੀ ਸੰਗਰਾਮ ਦੀ ਤਵਾਰੀਖ਼ ਨੂੰ ਪ੍ਰਣਾਈ ਸਾਂਝੀ ਧਰਤੀ, ਸਾਂਝੀ ਵਿਰਾਸਤ ਦੀ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਤੋਂ ਇਸ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ ਲਈ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ‘ਚ ਵੀ ਉੱਦਮ ਜੁਟਾਏ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਕੈਨੇਡਾ, ਅਮਰੀਕਾ, ਇੰਗਲੈਂਡ ਆਦਿ ਦੇਸ਼ਾਂ ਅੰਦਰ ਵੀ ਇਸ ਦੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਾ ਲਈ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਮੁਹਿੰਮ ਕਮੇਟੀਆਂ ਦੇ ਗਠਨ ਨੂੰ ਭਰਵਾਂ ਹੁੰਗਾਰਾ ਮਿਲ ਰਿਹਾ ਹੈ।
ਅੱਜ ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਹਾਲ ਜਲੰਧਰ ਦੇ ਦੁਆਰ ਅੱਗੇ ਬਣੇ ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਬਾਲ ਜਰਨੈਲ ਸ਼ਹੀਦ ਕਰਤਾਰ ਸਿੰਘ ਸਰਾਭਾ ਮੰਚ ਤੋਂ ਇਹ ਕੈਲੰਡਰ ਜਾਰੀ ਕਰਕੇ ਲੋਕ ਹੱਥਾਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਾਉਣ ਦੀ ਮੁਹਿੰਮ ਦਾ ਆਗਾਜ਼ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਮੌਕੇ ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕਮੇਟੀ ਜਲੰਧਰ ਦੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਡਾ. ਰਘਬੀਰ ਕੌਰ, ਉਪ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਤੇ ਗ਼ਦਰ ਸ਼ਤਾਬਦੀ ਮੁਹਿੰਮ ਕਮੇਟੀ ਕੋਆਰਡੀਨੇਟਰ ਨੌਨਿਹਾਲ ਸਿੰਘ, ਕੋ-ਕੋਆਰਡੀਨੇਟਰ ਗੁਰਮੀਤ, ਇਸ ਕੈਲੰਡਰ ਦੇ ਲੇਖਕ, ਨਿਰਦੇਸ਼ਕ ਅਤੇ ਟਰੱਸਟੀ ਡਾ. ਵਰਿਆਮ ਸਿੰਘ ਸੰਧੂ, ਵਿੱਤ ਸਕੱਤਰ ਰਘਬੀਰ ਸਿੰਘ ਛੀਨਾ, ਸਭਿਆਚਾਰਕ ਵਿੰਗ ਦੇ ਕਨਵੀਨਰ ਅਮੋਲਕ ਸਿੰਘ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਚਰੰਜੀ ਲਾਲ ਕੰਗਣੀਵਾਲ ਤੇ ਹਰਬੀਰ ਕੌਰ ਬੰਨੂਆਣਾ ਵੀ ਹਾਜ਼ਰ ਸਨ।
ਇਸ ਕੈਲੰਡਰ ਦਾ ਮੁੱਖ ਪੰਨਾ ਹੀ ਬੀਤੇ ਸੌ ਵਰ੍ਹਿਆਂ ਦੇ ਇਤਿਹਾਸ ਦੀਆਂ ਅਭੁੱਲ ਪੈੜ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸੰਗਮ ਅਤੇ ਲਹੂ ਵੀਟਵੇਂ ਅਜ਼ਾਦੀ ਸੰਗਰਾਮ ਦੀ ਸਰਗਮ ਹੈ। ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਝੰਡਿਆਂ ਦੀ ਲੋਅ ‘ਚੋਂ ਉਭਰਦਾ ਸੁਨੇਹਾ ਸਾਡੇ ਸਮਿਆਂ ਲਈ ਤਿੱਖੀ ਵੰਗਾਰ ਹੈ:
ਹਿੰਦ ਵਾਸੀਓ ਰੱਖਣਾ ਯਾਦ ਸਾਨੂੰ,
ਕਿਤੇ ਦਿਲਾਂ ‘ਚੋਂ ਨਾ ਭੁਲਾ ਜਾਣਾ।
ਜਨਵਰੀ 2013 ਤੋਂ ਦਸੰਬਰ 2013 ਤੱਕ ਮਹੀਨੇਵਾਰ ਢੁਕਵੇਂ ਇਤਿਹਾਸਕ ਕਾਲ, ਤਸਵੀਰਾਂ, ਤੱਥਾਂ ਅਤੇ ਉਪਲੱਭਧ ਵੇਰਵਿਆਂ ਦੀ ਵਰਨਣਯੋਗ ਤਸਵੀਰ ਦਾ ਗੁਲਦਸਤਾ ਤਿਆਰ ਕਰਨ ਲਈ ਜੁਟਾਈ ਮਿਹਨਤ ਕੈਲੰਡਰ ਵੇਖਿਆ ਹੀ ਬਣਦੀ ਹੈ। ਮੂੰਹੋਂ ਬੋਲਦਾ ਇਤਿਹਾਸਕ ਵੇਰਵਾ, ਧੁਰ ਮਨੋਂ ਝੰਜੋੜਦੇ ਵਲਵਲੇ, ਅੰਤਰ-ਝਾਤ, ਸਵੈ-ਮੰਥਨ ਅਤੇ ਅਜੋਕੀਆਂ ਵੰਗਾਰਾਂ ਦੇ ਸਨਮੁੱਖ ਕੀ ਕਰਨਾ ਲੋੜੀਏ? ਵਰਗੇ ਸਵਾਲਾਂ ਦਾ ਝੁਰਮਟ ਖੜ੍ਹਾ ਕਰਦਾ ਹੈ ਇਹ ਇਤਿਹਾਸਕ ਕੈਲੰਡਰ।
ਜਨਵਰੀ (ਗ਼ਦਰ ਪਾਰਟੀ ਸਥਾਪਨਾ), ਫਰਵਰੀ (ਯੁਗਾਂਤਰ ਆਸ਼ਰਮ), ਮਾਰਚ (ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਸਿੱਖ ਟੈਂਪਲ), ਅਪ੍ਰੈਲ (ਕਾਮਾਗਾਟਾ ਮਾਰੂ), ਮਈ (ਕਾਗਦ ਨਹੀਂ ਇਹ ਝੰਡਾ ਹੈ), ਜੂਨ (ਸਾਜ਼ਿਸ਼ ਕੇਸਾਂ ਅਤੇ ਸਜ਼ਾਵਾਂ ਦਾ ਸਿਲਸਿਲਾ), ਜੁਲਾਈ (ਗ਼ਦਰੀਆਂ ਦਾ ਗੜ੍ਹ ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਝਾੜ ਸਾਹਿਬ), ਅਗਸਤ (ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਕਦੇ ਕਿਸੇ ਗੀਤ ਨਾ ਗਾਇਆ), ਸਤੰਬਰ (ਸੈਲੂਲਰ ਜੇਲ੍ਹ ਕਾਲੇ ਪਾਣੀ), ਅਕਤੂਬਰ (ਗ਼ਦਰ ਦੇ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨੀ ਹੀਰੇ), ਨਵੰਬਰ (ਦੇਸ਼ ਭਗਤ ਯਾਦਗਾਰ ਕੇਂਦਰ), ਦਸੰਬਰ (ਲਾਹੌਰ ਸੈਂਟਰਲ ਜੇਲ੍ਹ ‘ਚ ਫਾਂਸੀ ਦਾ ਫੰਦਾ) ਦੀਆਂ ਦੁਰਲੱਭ ਮੌਲਿਕ ਤਸਵੀਰਾਂ ਅਤੇ ਪ੍ਰਮਾਣਿਕ ਵੇਰਵਾ ਮੁੱਲਵਾਨ ਕਿਤਾਬਚੇ ਨੂੰ ਕੈਲੰਡਰ ਦੇ ਲਿਬਾਸ ‘ਚ ਪੇਸ਼ ਕਰਨ ਦੀ ਜੁਗਤ ਦਾ ਖੂਬਸੂਰਤ ਪ੍ਰਮਾਣ ਹੈ।
ਇਹ ਕੈਲੰਡਰ ਜਾਰੀ ਕਰਦਿਆਂ ਕਮੇਟੀ ਨੇ ਦੇਸ਼-ਬਦੇਸ਼ ਦੀਆਂ ਸਮੂਹ ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਅਤੇ ਵਿਅਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਲੋਕ ਹੱਥਾਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਾਉਣ ਲਈ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਹੈ।

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